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| जब चिकन पॉक्स हुआ था। दवाई लेने के लिये इन्तज़ार कर रहे थे। मेरे बाद घर मे भैया और दीदी को भी हो गया था। डॉक्टर ने बोला था, अच्छा है सबको एक साथ ही हो गया। जो भी हो अब शायद फ़िर कभी नही होना चाहिये। |
लेकिन ’सबसे अच्छी तारीख’ आज के अमर उजाला मे छपी कविता है जो मुझे बहुत पसन्द आयी।
थोड़ा सा आसमान थोड़ी-सी हवा
थोड़ी सी आहट
बची रहती है हर तारीख में
यही कहीं है वे लचीली तारीखें
वे हवादार जगहें
जहां हम सब से ज्याद जीवित होते हैं
शब्दों को स्वाद में बदलते हुए
नामों को चेहरों में
और रंगो को संगीत मेंवर्ष अपनी गठरी में लाते हैं
असंख्य तारीखें
और उनहे फैला देते है पृथ्वी पर
तारीखें तनती हैं
तमतमाये चेहरों की तरह
इतवार की तमाम तारीखें घूरती हैं
लाल आखों से
तारीखें चिल्लाती हैं भूख
तारीखें चिल्लाती हैं न्यायकुछ ही तारीखें हैं जो निर्जन रेहती हैं
पुराने घरों की तरह
उदास काली खोखली तारीखें
जिनमें शेष नहीं हैं ताकत
जो बर्दाश्त नहीं कर पाती बोझकुछ ही तारीखें हैं
जो पिछले महीनों पिछले वर्षो की
तारीखें होती हैं नदी के किनारो पर
भाग की तरह छूटी हुइसबसे अच्छी तारीख है वह
जिस पर टंगे रहते हैं घर भर के
धुले कपड़े जिसमें फैलती होती है
भोजन की गरम खुशबू जिसमें फूल पकते हैं
जिसमे रखी होती है चिटिठ्यां और यात्राएं
सबसे अच्छी तारीख है वह
जिसमें बर्फ गिरती है और आग जलती है
जो पानी की तरह चमकती है धूप में
इनसे भी अच्छी तारीख है वह
जो खाली रेहती है
जिसे हम काम से भरते हैं
वह तारीख जो बाहर रेहती है कैलेंडर के
-मंगलेश डबराल


चलो यह जानकर अच्छा लगा कि तुम स्वस्थ हो गयीं। घर वालों के साथ। तुम्हारी पसंद कविता की अच्छी है।
सौम्या, बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर। आप स्वस्थ हो गयीं, यह जानकर खुशी हुई। अब खूब पढ़ें, लिखें। बीमारी में भी आपने इतने अच्छे कार्टून व कविता से हम सबको रूबरू कराये, यह बड़ी बात है। शुभकामनाएं।
सौम्या खुशी हुई जानकर की अब तुम बिल्कुल ठीक हो गई हो।
इतनी बढ़िया कविता पढ़वाने के लिए शुक्रिया।
अच्छी कविता। कविता को हमारे साथ साझा करने लिए धन्यवाद।
bahot accha laga aap ke blog par aa kar...chhoti umr mein badiya likhne lagi hain aap...aur sabse acchi tarikh to aap ne jab ye kavita blog par daali wo hi ho gayi...
यह मेरी भी पसन्दीदा कविताओं में एक है सौम्या. मैंने तो कई साल पहले इसका एक बड़ा सा पोस्टर बना कर अपने कमरे में लगाया था. यहां इसे पढ़वाने के लिये धन्यवाद.
अरे वाह! अब एकदम ठीक हो गई लगता है, शाबाश. बहुत बढ़िया कविता चुन कर लाई हो. और भी अच्छी लगें तो पढ़वाना जरुर.
सौम्या, मंगलेश डबराल जी की षष्ठि-पूर्ति के सम्मान में हम अमर उजाला के रविवारीय परिशिष्ट में एक ऐसी कविता देना चाहते थे, जो हर उम्र के आम-ओ-खास पाठक के दिल को एक जैसी शिद्दत से छू सके। तुम्हारे जैसी जागरूक छात्रा को यह पसंद आई और बड़े-बुजुर्ग लोग तारीफ कर रहे हैं, इससे लगता है कि चयन ठीक ही था। कविता की इतनी अच्छी समझ के लिए तुम्हें ढेरों बधाई।
Awesome poem..............
ehh... 10x for style ))
saumya apka blog dekha. bahut hi accha laga. apne jitni sacchai ke sath apna blog likha hai uske liye apko Dhanyawad. Aniruddha Mishra (Buero Chief) Falgun Vishwa.